पूस की रात — प्रेमचंद
पूस की ठिठुरती रात में किसान हल्कू को बिना कंबल के अपने खेत की रखवाली करनी पड़ती है। एक तरफ कर्ज और गरीबी का बोझ है, तो दूसरी तरफ कड़ाके की ठंड और फसल बर्बाद होने का डर। यह कहानी दिखाती है कि कैसे मजबूर किसान अपने दुख में एक अजीब सुकून पा लेता है।
पूस की रात — प्रेमचंद
पूस की ठिठुरती रात में किसान हल्कू को बिना कंबल के अपने खेत की रखवाली करनी पड़ती है। एक तरफ कर्ज और गरीबी का बोझ है, तो दूसरी तरफ कड़ाके की ठंड और फसल बर्बाद होने का डर। यह कहानी दिखाती है कि कैसे मजबूर किसान अपने दुख में एक अजीब सुकून पा लेता है।